सूचना का समय

 आजकल सूचना भ्रामक होती जा रही है।भ्रामक करते हैं सूचना के साधन।अख़बार को ही ले लीजिए ,एक समय था जब हर सूचना तारीख के साथ छपती थी अब छपने वाली सूचना से तारीख गायब हो गयी।क्या ये महज एक गलती है।ये गलती नहीं है मैं मानता हूँ कि ये एक ऐसी योजना है जो धीरे धीरे लोगों के दिमाग में अख़बार की फोटो और कटिंग जो सोशल मीडिया पर पोस्ट होती हैं,उन पर अविश्वास करने का अभ्यास करवाया जा रहा है।लोग कहने लगे हैं कि कोई भी कभी की कटिंग पोस्ट कर लोगो को भ्रमित कर देते हैं ,इसलिए इन पर विश्वास न करें। सोशल मीडिया की तो बात ही निराली है।लोग दूसरों की पोस्ट को बिना जांचे परखे रिपोस्ट और फॉरवर्ड कर देतेहैं। लेकिन जब सूचना नहीं आयेगी तो लोग अंधरे में रहेंगे।जो पारदर्शिता शुरू हुई थी वही अब धीरे धीरे खत्म होने को है, क्योंकि जिन्हें पारदर्शिता लानी है वे ही भ्रम पैदा कर रहे हैं।प्रिंट मीडिया अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को समझे और हर खबर के प्रारंभ में तारीख और राज्य का नाम अवश्य लिखें ताकि पाठकों को खबर पढ़ते समय कोई भ्रम न रहे ।आम नागरिक पत्रकारों की भी जिम्मेदारी है कि अख़बार या ओडियो ,वीडियो की कटिंग डालें तो समय, स्थान आदि जरूर लिखे जिससे कि ये सूचना क्रांति चलती रहे और लोगों को सोशल मीडिया पर भरोसा बना रहे ।

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